होम्योपैथी चिकित्सा जगत के पुरोधा डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन
होम्योपैथी चिकित्सा जगत के पुरोधा डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन
गोरखपुर ने खोया अपना एक अनमोल रत्न
अमिट रेखा संतराज यादव सहजनवा
गोरखपुर यश भारती सम्मान से अलंकृत 90 वर्षीय चिकित्सक ने करीब सात दशकों तक की मानव सेवा, चिकित्सा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी छोड़ी अमिट छाप गोरखपुर। पूर्वांचल के प्रतिष्ठित होम्योपैथिक चिकित्सक, यश भारती सम्मान से अलंकृत और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। उनका जाना केवल चिकित्सा जगत की क्षति नहीं, बल्कि गोरखपुर की उस पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि का विदा होना है, जिसने चिकित्सा को व्यावसायिक दायरे से आगे बढ़ाकर जनसेवा, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने का प्रयास किया।
डॉ. बनर्जी की पहचान एक अनुभवी चिकित्सक के साथ अनुशासनप्रिय, समय के पाबंद और संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में रही। उन्होंने लगभग 67 वर्षों के लंबे चिकित्सकीय जीवन में होम्योपैथी के प्रचार-प्रसार, चिकित्सकों के संगठन और आम जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कार्य किया।
गोरखपुर में जन्म, कोलकाता से चिकित्सा शिक्षा और न्यूयॉर्क तक शैक्षणिक यात्रा डॉ. राम रतन बनर्जी का जन्म 3 जून 1936 को गोरखपुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकीय जुबिली इंटर कॉलेज में हुई। वर्ष 1952 में उन्होंने सेंट एंड्रयूज कॉलेज से इंटरमीडिएट तथा 1954 में विज्ञान स्नातक की शिक्षा प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने होम्योपैथी को अपना कार्यक्षेत्र चुना। वर्ष 1959 में कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल से स्वर्ण पदक के साथ चिकित्सा शिक्षा पूरी की। वर्ष 1975 में उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित द होमियो इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन से होम्योपैथिक साइंस में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
वर्ष 1959 में शुरू किया चिकित्सकीय सफर डॉ. बनर्जी ने वर्ष 1959 में होम्योपैथिक चिकित्सा सेवा शुरू की। गोरखपुर के बेनीगंज-रानीगोला स्थित संतोष होमियो सेवाश्रम उनकी चिकित्सकीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा।
उन्होंने निर्धन और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविरों और औषधि वितरण कार्यक्रमों को महत्व दिया। रामकृष्ण समिति सहित विभिन्न दातव्य चिकित्सालयों को भी उनका सहयोग मिलता रहा।
उनकी पेशेवर गतिविधियाँ गोरखपुर तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगोष्ठियों में भाग लिया तथा विभिन्न देशों के रोगियों से चिकित्सकीय संपर्क स्थापित किया।
2016 में यश भारती सम्मान से हुए अलंकृत
चिकित्सा क्षेत्र में योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2016 में उन्हें प्रतिष्ठित यश भारती सम्मान से अलंकृत किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में प्रदान किया गया यह सम्मान उनके लंबे चिकित्सकीय और सामाजिक योगदान की महत्वपूर्ण सार्वजनिक मान्यता थी।
वह होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की गोरखपुर इकाई के लगभग एक दशक तक अध्यक्ष रहे। गोरखपुर जिला होम्योपैथिक एसोसिएशन तथा होम्योपैथिक लीग से भी नेतृत्वकारी भूमिकाओं में जुड़े रहे। वह अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगठनों और चिकित्सकीय पत्रिकाओं से भी संबद्ध थे।
भोजपुरी में स्वास्थ्य की बात, जनजागरण को बनाया अभियान
डॉ. बनर्जी की विशेषता यह थी कि वह चिकित्सा संबंधी विषयों को सामान्य लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुँचाने का प्रयास करते थे। हिंदी, अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी पर उनकी अच्छी पकड़ थी। वह लैटिन भाषा से भी परिचित थे।
आकाशवाणी गोरखपुर से भोजपुरी में प्रसारित उनकी स्वास्थ्य संबंधी वार्ताएँ जनजागरूकता का माध्यम बनीं। दूरदर्शन और क्षेत्रीय टेलीविजन चैनलों पर भी उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम प्रस्तुत किए।रश्मि विजन चैनल पर उनके स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम 'हेल्थ प्लस' के 101 एपिसोड प्रसारित हुए। इसके अतिरिक्त उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पत्रिकाओं में लेख लिखे और 'चिकित्सा में अंधविश्वास' जैसे विषयों पर जनजागरण का प्रयास किया।
बंगाली समाज की सांस्कृतिक विरासत के भी थे संरक्षक
डॉ. राम रतन बनर्जी का व्यक्तित्व चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं था। वह गोरखपुर की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी बंगाली समिति के संरक्षक थे। शहर में सार्वजनिक दुर्गापूजा की प्राचीन परंपरा, उसके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व से उनका गहरा जुड़ाव था।गोरखपुर की बंगाली सांस्कृतिक परंपरा और उसके ऐतिहासिक दस्तावेजों से संबंधित जानकारियों को सामने लाने में भी उनकी भूमिका रही। वह आर्यनगर रामलीला समिति सहित अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े रहे।
खेल और रंगमंच से भी रहा गहरा लगाव
बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. बनर्जी विद्यार्थी जीवन में हॉकी और फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे। वर्ष 1951 से 1954 के दौरान वह सेंट एंड्रयूज कॉलेज की हॉकी टीम के कप्तान रहे।
अभिनय और रंगमंच में भी उनकी रुचि थी। अंग्रेजी, हिंदी और बंगला नाटकों में अभिनय के लिए विद्यार्थी जीवन में उन्हें सम्मान मिला। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी वह सक्रिय रहे।
तीन पीढ़ियों तक आगे बढ़ी चिकित्सा और सेवा की परंपरा
डॉ. बनर्जी के परिवार में चिकित्सा और समाजसेवा की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी। उनके पुत्र डॉ. रूप कुमार बनर्जी भी प्रतिष्ठित होम्योपैथिक चिकित्सक हैं। पौत्र डॉ. सौम्यो रतन बनर्जी तथा डॉ. अरुणिमा बनर्जी भी परिवार की चिकित्सा और सेवा संबंधी गतिविधियों से जुड़े हैं।परिवार की ओर से संतोष होमियो सेवा धाम के माध्यम से जरूरतमंद मरीजों के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविर भी आयोजित किए जाते रहे हैं।स्मृतियों में जीवित रहेगा सेवा और संवेदना का व्यक्तित्व
डॉ. राम रतन बनर्जी का जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि एक चिकित्सक का सामाजिक योगदान केवल अपने उपचार केंद्र तक सीमित नहीं रहता। रोगियों से संवाद, गरीबों की सहायता, स्वास्थ्य जागरूकता, चिकित्सकीय संगठनों को नेतृत्व और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में उनकी सक्रियता रही।
करीब सात दशकों की यह यात्रा गोरखपुर के चिकित्सा और सामाजिक इतिहास का उल्लेखनीय अध्याय है। उनका निधन एक ऐसे व्यक्तित्व की विदाई है, जिसकी पहचान चिकित्सा के साथ मानवीय संवेदना, अनुशासन और सामाजिक प्रतिबद्धता से जुड़ी रही।
डॉ. राम रतन बनर्जी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन चिकित्सा सेवा, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में उनका योगदान स्मरण किया जाता रहेगा।