शीतकालीन योग कार्यशाला के तीसरे दिन प्रतिभागियों में उत्साह

Dec 14, 2025 - 17:00
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शीतकालीन योग कार्यशाला के तीसरे दिन प्रतिभागियों में उत्साह

शीतकालीन योग कार्यशाला के तीसरे दिन प्रतिभागियों में उत्साह

अमिट रेखा/ विनीत कुमार 

गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय स्थित महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोधपीठ द्वारा कुलपति प्रो. पूनम टण्डन के संरक्षण में संचालित ‘योग एवं नाथपंथ’ विषयक सप्तदिवसीय शीतकालीन योग कार्यशाला का तीसरा दिन भी  सफल  रहा। 11 दिसंबर को आयोजित हुए इस सत्र में बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे और योग एवं नाथ परंपरा के गहरे आध्यात्मिक व वैज्ञानिक आयामों को समझने का अवसर मिला।

दिन की शुरुआत प्रातःकालीन योग प्रशिक्षण से हुई, जिसे डा. विनय कुमार मल्ल ने संचालित किया। उन्होंने प्रतिभागियों को सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, सिंहासन, पद्मासन, उत्तानपादासन सहित विभिन्न योगासनों का अभ्यास कराया। साथ ही प्राणायाम के माध्यम से शरीर-मन को संतुलित रखने के तरीकों पर भी विशेष प्रशिक्षण दिया। इस सत्र में स्नातक, परास्नातक तथा शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

पूर्वान्ह 11 बजे ऑनलाइन माध्यम से ‘हठयोग प्रदीपिका’ विषय पर विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ शोधपीठ के सहायक निदेशक डॉ. सोनल सिंह द्वारा मुख्य अतिथि के स्वागत के साथ हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. सोनू द्विवेदी, आचार्य, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, उत्तराखंड ने अपने ओजस्वी संबोधन में हठयोग प्रदीपिका के नाथयोग परंपरा में महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि हठयोग प्रदीपिका नाथ पं​थ की योग परंपरा का अद्वितीय और सर्वाधिक व्यावहारिक ग्रंथ है, जिसने योग की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. द्विवेदी ने आगे कहा कि हठयोग का उद्देश्य शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करना है। आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर की शुद्धि, संतुलन और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, जो नाथ परंपरा की मूल शिक्षा है।

ऑनलाइन व्याख्यान का संचालन शोधपीठ के रिसर्च एसोसिएट डॉ. सुनील कुमार ने किया। कार्यक्रम के अंत में शोध अध्येता डॉ. हर्षवर्धन सिंह ने मुख्य वक्ता, सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार जताया।
इस अवसर पर सहायक ग्रंथपाल डॉ. मनोज कुमार द्विवेदीचिन्मयानंद मल्ल सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षक और विश्वविद्यालय के कई विभागों के आचार्य भी जुड़े रहे, जिनमें डॉ. राजेश मिश्र और डॉ. रेनू चौधरी प्रमुख रूप से शामिल रहे।

शीतकालीन योग कार्यशाला का तीसरा दिन नाथयोग की परंपरा, हठयोग के सिद्धांतों और वैज्ञानिक पहलुओं के अध्ययन का प्रभावी मंच साबित हुआ, जिसने प्रतिभागियों में नई ऊर्जा और गहन जिज्ञासा का संचार किया।