ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिवेणी है श्रीमद्भागवत कथा (विश्वेश मणि उपाध्याय बृंदावन )
ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिवेणी है श्रीमद्भागवत कथा (विश्वेश मणि उपाध्याय बृंदावन )
अमिट रेखा /राम अशीष तिवारी
खजनी गोरखपुर श्रीमद्भागवत कथा भाव,ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और त्याग का महा संगम है कलयुग में श्रीमद्भागवत कथा भवसागर पार उतरने का एक सहज व सरल माध्यम है जिसके श्रंवण मात्र से ही मानव को ज्ञान, भक्ति, वैराग्य का प्राप्ति संभव है तुलसी दास ने भी मानस में वर्णन करते हुए लिखा है कि कलियुग सम नहीं आने युग जो नर कर विश्वास
भजहिं राम गुन गन विमल भव विनु तरहि प्रयास।।
भगवान की कथा पान करने से मानव भव सागर पार कर सकता है परंतु भाव व भक्ति एवं श्रद्धा तथा विश्वास के साथ कथा का श्रवण किया जाय तब यह संभव है।
महाराज परिक्षित व धुंधकारी को मोक्ष प्राप्ति के लिए श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने का उपाय श्रृषि, महर्षियों तथा मुनियों एवं साक्षात भगवान ने ही बताया था धुंधकारी जैसे अधम अत्याचारी को प्रेत योनि से छुटकारा पाने के लिए उनके भाई गोकर्ण को श्रीमद्भागवत कथा का ही श्रवण करना पड़ा।
तथा महाराज परिक्षित को सर्प दंश से मृत्यु के पहले मोक्ष प्राप्त करने हेतु भगवान शुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने का उपाय ऋषि, महर्षियों ने उन्हें बताया था।
उक्त बचनामृत नगर पंचायत उनवल के वार्ड 14 में जनार्दन मिश्रा के वहां चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रीमद्भागवत कथा के महात्म पर उपस्थित लोगों को कथा का रस पान कराते हुए बृंदावन से पधारे श्रीमद्भागवत कथा के मर्मज्ञ विश्वेश मणि उपाध्याय उर्फ पूज्य पंकज जी महराज ने कहा और बताया कि चतुराई को त्याग कर मन,बचन,कर्म से जब श्रीमद्भागवत कथा को श्रवण किया जाय तो अवश्य ही ईश्वर की कृपा होती है आप सभी लोग धन्य है जो भगवान की कथा का रसपान कर रहे हैं यह सौभाग्य सब को नहीं मिलता है।