पेट भरने वाला किसान खुद भूख व कर्ज के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहा है-अशोक सिंह

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अमिट रेखा
जितेन्द्र कुमार सिंह
तहसील प्रभारी देवरिया

रामपुर कारखान देवरिया-राजनीति क्षेत्र से जुड़े व पूर्व महामंत्री बी0आर0डी0 कॉलेज देवरिया के छात्र नेता व जिला पंचायत प्रत्याशी रामपुर कारखाना क्षेत्र रामपुर चंद्रभान गांव निवासी अशोक सिंह ने देश में चल रहे किसानों के आंदोलन को लेकर “आज संवाददाता” से अपनी बेबाक टिप्पणी कुछ इस तरह रखी। उन्होंने कहा भारत कृषि प्रधान देश है तथा अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है देश के विकास दर की वृद्धि में कृषि क्षेत्र की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में कृषि संकट की समस्याओं के उचित समाधान के अभाव में लोगों का खेती से मोहभंग भी हो रहा है। काफी संख्या में किसान आत्महत्या करने पर विवश हो रहे हैं, जो दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के नाम पर कलंक है। कैसी विडंबना है कि अन्नदाता कहा जाने वाला सबका पेट भरने वाला किसान खुद भूख व कर्ज के कारण जीवन लीला समाप्त कर रहा है। अमेरिका के किसानों की तुलना में हमारे देश के किसानों की आय काफी कम है। लोगों को जिंदा रखने के लिए भुखमरी कुपोषण से बचाने के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए कृषि एवं किसानों की समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान की आवश्यकता है। उन्होंने कहा अभी सरकार ने कृषि संबंधी जो विधेयक संसद में पेश किया था और वह संसद से पास होकर अब कानून बन गया है उससे किसानों ने भय व भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसी कारण देश के अनेक भागों में किसान आंदोलित हो गया है। वास्तविकता यह है कि इस कानून में काफी कमी है और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को सम्मिलित नहीं किया गया। कृषि बहुत बड़ा क्षेत्र है इस पर 60 से 70% लोगों की आजीविका निर्भर करती है। एक ही विषय पर रोज-रोज कानून नहीं बनाए जाते हैं इसलिए सरकार का यह दायित्व है कि कृषि और किसानों से संबंधित एक विस्तृत विधेयक किसानों की राय लेकर तैयार किया जाए जिससे किसानों की समस्याओं का पूरी तरह समाधान हो तथा किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाला हो। वर्तमान में कानून में किसानों को अपनी उपज बिना किसी रोक के पूरे देश में बेचने की छूट देना एक अच्छा कदम है किंतु व्यवहार में धरातल पर इससे किसान को लाभ नहीं मिलेगा। किसानों की मजबूरी है कि वह अपनी उपज 10 से 15 दिन के अंदर बेच दे क्योंकि किसान को अगली फसल के लिए पूंजी चाहिए बैंक से लिए गए जिनकी धनराशि को बैंक में जमा करने के बाद ही बैंक पुन: अगली फसल के लिए कर्ज देगा तथा किसान अपनी उपज को लंबी समय तक अपने घर रख नहीं सकता अगर किसान अपनी उपज नहीं बेचता है ऐसी स्थिति में जींस खराब होने लगता है। इन्हीं परिस्थितियों के कारण किसान को अपनी उपज शीघ्र बेच देना भी बाध्यता है। अक्सर यह देखा गया है कि जब किसी चीज की पैदावार ज्यादा हो जाती है तब उसका दाम बाजार में गिर जाता है इन्हीं परिस्थितियों में किसान मजबूर होकर अपनी उपज औने पौने दाम में बेचने को मजबूर हो जाता हैऔर उसे भारी हानि का सामना करना पड़ता है ऐसी स्थिति में किसान को बचाने के लिए एम एस पी की कानूनी आवश्यकता है जिसका कानून में प्राविधान ना होना दुखद है। विधेयक के प्रारूप में किसानों की उपज की खरीद की गारंटी न देकर किसानों का अहित किया जा रहा है। अगर विधेयक में किसानों की उपज की सरकार द्वारा खरीदी की व्यवस्था होती तो किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर खरीद एजेंसियां किसानों का शोषण नहीं कर पाती सरकार चाहे किसी की बने खरीद करना ही पड़ता। इस महत्वपूर्ण विषय को विधेयक मेंं लाना किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता है अच्छा होता कि विधेयक में सरकारी खरीद की अनिवार्यता के साथ प्रतिवर्ष खरीद के लिए निर्धारित एम एस पी में 10% की बढ़ोतरी का भी उल्लेख होता। हमारे देश में गन्ना कमर्शियल कृषि मानी जाती है इसमें गन्ना किसानों की समस्या को सुलझाने किसानों को शोषण से बचाने आदि की कोई चर्चा नहीं है। गन्ना किसानों के साथ भुगतान को लेकर जो अन्याय किया जा रहा है इससे बचाव के लिए कानून में चीनी मिलों को नगद भुगतान करने की व्यवस्था वैधानिक रूप से सुनिश्चित की जानी चाहिए थी जो नहीं किया गया है। अगर चीनी मिलें अपने उत्पाद को अग्रिम धनराशि लेकर बेचती है फिर किसानों को नगद भुगतान क्यों नहीं? यदि इस विधेयक में नगद भुगतान की व्यवस्था होती तो किसानों और शासन दोनों को गन्ना किसानों की समस्या से मुक्ति मिल जाती। क्योंकि नगद भुगतान के बाद कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। कांट्रैक्ट फार्मिंग की उपयोगिता समझ से परे है क्या सरकार किसानों को खेती करने के लायक नहीं समझती, जो बड़े-बड़े पूंजीपति खेती करने आएंगे। किसान की खेती उत्पादन बिक्री के क्षेत्र में पूंजीपतियों के प्रवेश से किस तरह किसान लाभान्वित होगा, व्यवहार में सिर्फ जटिलताएं मुकदमे बाजी और अंततोगत्वा किसान का ही नुकसान होगा। यदि सरकार किसानों की स्थिति में सुधार करना चाहती है, इनकी आय बढ़ाना चाहती है, देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहती है, किसानों को आत्महत्या करने से बचाना चाहती है, किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित वैधानिक व्यवस्था करना चाहती है, तो अगले मानसून सत्र में कृषि संबंधी एक व्यापक विधेयक लाना चाहिए इस पर सदन में विस्तृत चर्चा होने के समय किसानों की राय ली जाए किसानों के उत्पाद को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के उपाय के लिए कृषि वैज्ञानिकों को आगे आकर रिसर्च करने, रोगाणु विरोधी किस्में में तैयार करने का प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्था की जाए तभी किसानों की स्थिति मजबूत हो सकती है अच्छा होगा यदि खेती को उद्योग के रूप में विकसित करने हेतु तुरंत प्रभावी कदम उठाए जाएं।

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